विवेकपूर्ण वाणी बन सकती है कल्याणी : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

वर्ष 2025 का शांतिदूत का चतुर्मासकाल अब सम्पन्नता की ओर

आचार्यश्री की मंगल वाणी से निहाल हुए श्रद्धालु

गांधीनगर (गुजरात) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी का वर्ष 2025 का अहमदाबाद का चतुर्मास अब मात्र पांच दिन शेष रहा है। चार महीने तक कोबा में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में विराजमान होकर आचार्यश्री ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई है जो अहमदाबादवासियों व गुजरातवासियों को नहीं, अपितु इससे जुड़ने वाले समस्त श्रद्धालुओं के मानस को निर्मल बनाने वाली रही है। प्रतिदिन प्रेक्षा विश्व भारती के परिसर में बने भव्य एवं विशाल ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में लोग उपस्थित होकर लाभ उठाते रहे हैं।



शुक्रवार को भी महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित श्रद्धालुओं को ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में मधुरभाषी लोग मिल सकते हैं तो कर्कषभाषी लोग भी मिल सकते हैं। बोलना जीवन की एक आवश्यकता है। मौन करना भी अच्छा होता है तो कई जगह बोलना भी अच्छा और लाभदायी होता है। आदमी को कब बोलना, कब नहीं बोलना, क्या बोलना और क्या नहीं बोलना, इसका विवेक रखने का प्रयास हो तो बोलना बहुत कल्याणकारी हो सकता है। तीर्थंकर प्रवचन करने वाले होते हैं। यदि तीर्थंकर मौन करके बैठ जाएं तो ज्ञान प्राप्त में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए तीर्थंकर भगवान के बोलने का महत्त्व है। आदमी को विवेकपूर्ण बोलने का प्रयास करना चाहिए।



क्या, कब और कैसे बोलना- इसका विवेक हो जाए तो आदमी की वाणी कल्याणकारी हो सकती है। आदमी को जितना संभव हो सके, कठोर भाषा से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को कटु बोलने से बचने का प्रयास करना चाहिए। कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो साधु को भी कठोर बोल देते हैं। किसी के घर में किसी की मृत्यु हो जाती है, तब आदमी सांत्वना की भाषा बोलता है, ताकि उसके परिजनों को आत्मतोष हो। दुःखी आदमी को सदुपदेश के द्वारा उसके चित्त के समाधि में लाए, यह भी एक बड़े सहयोग की बात होती है। अगर किसी ने आपका उपकार किया है तो उसके भी सहयोग भी भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। किसी को अध्यात्म की ओर बढ़ाना आध्यात्मिक लाभ होता है। आत्मकल्याणकारी सेवा लोकोत्तर सेवा होती है और आध्यात्मिक सेवा तो मोक्ष को प्रदान करने वाली भी बन सकती है। किसी के पास विशेष रूप से अर्थ है तो उसे किसी दूसरे के सहयोग में लगाने का प्रयास होना चाहिए। दयालु लोग अर्थ का दान कर उसके दुःख और दर्द में कुछ सहयोग और सेवा भी करते हैं। साधु तो दूसरों की आत्मा का कल्याण करते हैं, वे लोकोत्तर उपकार करते हैं। साधु के लिए तो कहा गया है कि साधु को कोई कष्ट दे तो भी साधु के मन में उसके कल्याण की भावना होनी चाहिए।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त अहमदाबाद चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के महामंत्री अरुण बैद, कोबा के कार्पोरेटर योगेशभाई ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने समुपस्थित पटेल समाज के लोगों को शराब से मुक्त रहने की प्रतिज्ञा करवाते हुए मंगल प्रेरणा प्रदान की।

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